Friday, December 21, 2018

जीवन की सार्थकता

जीवन की सार्थकता

प्राणी की जीवन की यात्रा जन्म से प्रारम्भ हो जाती है। उसकी मंजिल निर्धारित होती है। यहाँ इस पवित्रा पुस्तक में मानव जीवन की यात्रा के मार्ग पर विस्तारपूर्वक वर्णन है। मानव (स्त्राी/पुरूष) की मंजिल मोक्ष प्राप्ति है। उसके मार्ग में पाप तथा पुण्य कर्मों के गढ्ढ़े तथा काँटे हैं। आप जी को आश्चर्य होगा कि पाप कर्म तो बाधक होते हैं, पुण्य तो सुखदाई होते हैं। इनको गढ्ढे़ कहना उचित नहीं।



मानव जीवन परमात्मा की शास्त्राविधि अनुसार साधना करके मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्राप्त होता है। पाप कर्म का कष्ट भक्ति में बाधा करता है। उदाहरण के लिए पाप कर्म के कारण शरीर में रोग हो जाना, पशु धन में तथा फसल में हानि हो जाना। ऋण की वृद्धि करता है। ऋणी व्यक्ति दिन-रात चिंतित रहता है। वह भक्ति नहीं कर पाता। पूर्ण सतगुरू से दीक्षा लेने के पश्चात् परमेश्वर उस भक्त के उपरोक्त कष्ट समाप्त कर देता है। तब भक्त अपनी भक्ति अधिक श्रद्धा से करने लगता है। परमात्मा पर विश्वास बढ़ता है, दृढ़ होता है। परंतु भक्त को परमात्मा के प्रति समर्पित होना चाहिए। जैसे पतिव्रता स्त्राी अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरूष को कामपूर्ति (Sexual Satisfaction) के लिए स्वपन में भी नहीं चाहती चाहे कोई कितना ही सुंदर हो। उसका पति अपनी पत्नी को हरसंभव कोशिश करके सर्व सुविधाऐं उपलब्ध करवाता है। विशेष प्रेम करता है। इसी प्रकार दीक्षा लेने के पश्चात् आत्मा का संयोग परमात्मा से होता है। गुरू जी आत्मा का विवाह परमात्मा से करवा देता है। यदि वह मानव शरीरधारी आत्मा अपने पति परमेश्वर के प्रति पतिव्रता की तरह समर्पित रहती है यानि पूर्ण परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी देवी-देवता से मनोकामना की पूर्ति नहीं चाहती है तो उसका पति परमेश्वर उसके जीवन मार्ग में बाधक सब पाप कर्मों के काँटों को बुहार देता है। उस आत्मा की जीने की राह सुगम व बाधारहित हो जाती है। उसको मंजिल सरलता से मिल जाती है। उस आत्मा के लिए परमात्मा क्या करता है? उसको संत गरीबदास जी ने परमेश्वर कबीर जी से प्राप्त ज्ञान को इस प्रकार बताया है:-
गरीब, पतिव्रता जमीं पर, ज्यों-ज्यों धरि है पाँवै।
समर्थ झाड़ू देत है, ना काँटा लग जावै।।
कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि:-
कबीर, साधक के लक्षण कहूँ, रहै ज्यों पतिव्रता नारी।
कह कबीर परमात्मा को, लगै आत्मा प्यारी।।
पतिव्रता के भक्ति पथ को, आप साफ करे करतार।
आन उपासना त्याग दे, सो पतिव्रता पार।।
भक्ति करने से पाप नष्ट हो जाते हैं जो भक्ति की राह में रोड़े बनते हैं।
कबीर, जब ही सत्यनाम हृदय धरो, भयो पाप को नाश।
जैसे चिंगारी अग्नि की, पड़ै पुराने घास।।

इसलिए पूर्ण गुरू से दीक्षा लेकर प्रत्येक स्त्राी-पुरूष, बालक (तीन वर्ष के पश्चात्) वृद्ध-युवा को भक्ति अवश्य करनी चाहिए।
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